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जमीन बेचने के नाम पर गरीबों को ठगने वाले गिरोह से सावधान! कानपुर में प्लॉट के नाम पर कथित धोखाधड़ी के आरोप

घर बनाने का सपना दिखाकर लोगों से लाखों रुपये वसूलने का आरोप; दूसरी जमीन देने या रकम लौटाने के नाम पर कथित तौर पर टालमटोल। पुलिस से कार्रवाई की मांग, स्टेट मीडिया 24 के पास पहुंचे ऐसे करीब दो दर्जन मामलों का दावा.

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कानपुर। हर व्यक्ति का सपना होता है कि वह मेहनत की कमाई से अपने परिवार के लिए एक छोटा-सा घर बना सके। खासकर नौकरीपेशा मध्यमवर्गीय परिवार और आर्थिक रूप से कमजोर लोग अपनी आय का बड़ा हिस्सा बचाकर जमीन या प्लॉट खरीदने की कोशिश करते हैं। लेकिन यदि इसी सपने को पूरा करने के नाम पर किसी के साथ धोखाधड़ी हो जाए, तो उसकी वर्षों की मेहनत और जमा पूंजी खतरे में पड़ सकती है। कानपुर में कुछ रियल एस्टेट कंपनियों के खिलाफ इसी तरह के आरोप सामने आने का दावा किया जा रहा है। आरोप है कि कुछ कंपनियां लोगों को किस्तों पर प्लॉट देने का भरोसा दिलाती हैं, उनसे लंबे समय तक पैसे जमा कराती हैं और बाद में जमीन देने या रकम वापस करने में आनाकानी करती हैं हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित कंपनियों का पक्ष सामने आना अभी आवश्यक है। किसी भी कंपनी या व्यक्ति को जांच और न्यायिक प्रक्रिया से पहले दोषी नहीं माना जा सकता।

तीन से पांच साल की किस्तों का भरोसा, फिर जमीन के लिए इंतजार

शहर में रहने वाले अनेक मध्यमवर्गीय और गरीब परिवार अपनी सीमित आय के बावजूद भविष्य सुरक्षित करने के लिए जमीन खरीदने की योजना बनाते हैं। ऐसे में यदि कोई कंपनी उन्हें तीन या पांच साल तक आसान किस्तों में भुगतान करने और उसके बाद प्लॉट का मालिकाना हक देने का प्रस्ताव देती है, तो यह योजना उन्हें आकर्षित कर सकती है। आरोपों के मुताबिक, कुछ मामलों में लोगों को बताया जाता है कि वे निर्धारित अवधि तक नियमित किस्तें जमा करें और भुगतान पूरा होने पर उन्हें तय स्थान पर प्लॉट दे दिया जाएगा। ग्राहकों का भरोसा जीतने के लिए कथित तौर पर उन्हें जमीन दिखाई जाती है और दस्तावेज भी उपलब्ध कराए जाते हैं। देखने में ये कागजात किसी औपचारिक समझौते जैसे लग सकते हैं, जिससे ग्राहक भुगतान करने के लिए तैयार हो जाते हैं। लेकिन जमीन खरीदने से पहले केवल दस्तावेजों की शक्ल देखकर भरोसा करना जोखिम भरा हो सकता है। जमीन का वास्तविक मालिक कौन है, उसका खसरा-खतौनी रिकॉर्ड क्या है, कहीं उस पर विवाद तो नहीं है और कंपनी को उसे बेचने का कानूनी अधिकार है या नहीं इन सभी बातों की जांच जरूरी है।

पूरी किस्तें जमा होने के बाद बदल जाता है रवैया?

शिकायतों में लगाए गए आरोपों के अनुसार, विवाद उस समय शुरू होता है जब ग्राहक निर्धारित किस्तें पूरी करने के बाद कंपनी से अपने प्लॉट की रजिस्ट्री या कब्जा देने की मांग करते हैं। आरोप है कि कुछ ग्राहकों को उस समय बताया जाता है कि जमीन की कीमत बढ़ चुकी है और पहले दिखाई गई जमीन अब नहीं दी जा सकती। इसके बदले किसी दूसरी जगह प्लॉट लेने का विकल्प दिया जाता है। पीड़ितों का कथित आरोप है कि कुछ मामलों में उन्हें ऐसी दूसरी जमीन दिखाई जाती है, जो उनकी पसंद, जरूरत या शुरुआती समझौते के अनुरूप नहीं होती। इस स्थिति में ग्राहक के सामने मुश्किल खड़ी हो जाती है। एक तरफ वह वर्षों तक किस्तों में रकम जमा कर चुका होता है, तो दूसरी तरफ उसे तय जमीन नहीं मिलती। यदि कंपनी और ग्राहक के बीच वास्तव में ऐसा विवाद हुआ है, तो उसका समाधान समझौते, भुगतान के रिकॉर्ड, जमीन के दस्तावेज और लागू कानून के आधार पर किया जाना चाहिए। ग्राहकों को भी चाहिए कि वे मौखिक आश्वासनों के बजाय लिखित शर्तों और वैधानिक दस्तावेजों के आधार पर ही आगे बढ़ें।

पैसा मांगने पर चेक, फिर भुगतान न होने की शिकायत

इन आरोपों का एक अन्य गंभीर पहलू रकम वापसी से जुड़ा है। शिकायतकर्ताओं के मुताबिक, जब वे प्लॉट नहीं मिलने पर अपनी जमा राशि वापस मांगते हैं, तो कथित तौर पर उन्हें कंपनी का चेक दिया जाता है। आरोप है कि बैंक में चेक जमा करने पर वह भुगतान के बिना वापस हो जाता है, जिससे ग्राहक की परेशानी और बढ़ जाती है। चेक बाउंस होने के मामलों में परिस्थितियों के अनुसार कानूनी उपाय उपलब्ध हो सकते हैं। हालांकि, किसी मामले में केवल चेक बाउंस होना और किसी शुरुआत से कथित धोखाधड़ी की योजना होना—दोनों अलग-अलग कानूनी पहलू हैं। यदि किसी व्यक्ति को शुरुआत से ही झूठे वादे करके पैसा देने के लिए प्रेरित किया गया हो, तो संबंधित तथ्यों और साक्ष्यों की जांच आवश्यक है। इसलिए ऐसे मामलों को केवल एक सामान्य भुगतान विवाद मानकर नजरअंदाज करने के बजाय शिकायत में लगाए गए सभी आरोपों की निष्पक्ष जांच की मांग उठती है।

पुलिस की भूमिका पर उठ रहे सवाल

शिकायतकर्ताओं की ओर से पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर भी सवाल उठाए जाने का दावा किया गया है। आरोप है कि कुछ पीड़ित जब अपनी शिकायत लेकर पुलिस के पास पहुंचते हैं, तो उन्हें चेक बाउंसिंग का मामला बताकर अदालत जाने की सलाह दी जाती है। यहां महत्वपूर्ण सवाल है कि क्या शिकायत में केवल भुगतान न होने का विवाद है या फिर जमीन बेचने के नाम पर कथित धोखाधड़ी, फर्जी दस्तावेज, गलत जानकारी अथवा अन्य किसी संज्ञेय अपराध के आरोप भी शामिल हैं? इसका निर्णय शिकायत और उपलब्ध साक्ष्यों की जांच के आधार पर होना चाहिए। यदि किसी शिकायत में संज्ञेय अपराध के तथ्य सामने आते हैं, तो पुलिस को लागू कानून और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार कार्रवाई करनी चाहिए। वहीं, जहां मामला मुख्य रूप से भुगतान या अनुबंध से जुड़ा हो, वहां पीड़ित को उचित कानूनी उपाय की जानकारी दी जानी चाहिए। निष्पक्ष जांच से ही स्पष्ट हो सकता है कि मामला किस प्रकृति का है और किसकी क्या जिम्मेदारी बनती है।

यूपी क्राइम अलर्ट का दावा करीब दो दर्जन मामले सामने आए

यूपी क्राइम अलर्ट के मुताबिक, उसके पास जमीन और प्लॉट के नाम पर कथित धोखाधड़ी से जुड़े करीब दो दर्जन मामले आने का दावा किया गया है। चैनल का कहना है कि वह इन मामलों से जुड़े दस्तावेज, शिकायतें, भुगतान के रिकॉर्ड और संबंधित पक्षों के बयान जुटाकर विस्तृत पड़ताल करेगा। यदि इन शिकायतों में एक जैसी कार्यप्रणाली सामने आती है, तो यह जांच का महत्वपूर्ण विषय हो सकता है। हालांकि, शिकायतों की संख्या अपने आप में आरोपों को प्रमाणित नहीं करती। प्रत्येक मामले में अलग-अलग तथ्यों और साक्ष्यों की जांच जरूरी होगी। संबंधित कंपनियों का पक्ष लेना और उनका जवाब प्रकाशित करना भी निष्पक्ष पत्रकारिता का अहम हिस्सा है। चैनल की ओर से संकेत दिया गया है कि आगामी रिपोर्टों में संबंधित कंपनियों की पहचान, शिकायतकर्ताओं के आरोपों और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर मामले की विस्तृत जानकारी सामने लाने का प्रयास किया जाएगा। किसी भी कंपनी के बारे में निष्कर्ष प्रस्तुत करने से पहले दस्तावेजों की पुष्टि और संबंधित पक्षों का जवाब लेना आवश्यक होगा।

जमीन खरीदने से पहले इन बातों का रखें ध्यान

विशेषज्ञों और कानूनी प्रक्रिया से जुड़ी सामान्य सावधानियों के अनुसार, प्लॉट खरीदने से पहले ग्राहकों को कुछ जरूरी कदम उठाने चाहिए:

  1. जमीन के स्वामित्व की जांच करें: संबंधित राजस्व रिकॉर्ड, खसरा-खतौनी और उपलब्ध स्वामित्व दस्तावेजों की पुष्टि कराएं।
  2. कंपनी की वैधानिक स्थिति देखें: जहां लागू हो, कंपनी के पंजीकरण और परियोजना से संबंधित RERA पंजीकरण की जांच करें।
  3. लिखित समझौता पढ़ें: प्लॉट का नंबर, क्षेत्रफल, कीमत, भुगतान की शर्तें, कब्जा देने की तारीख और रकम वापसी के नियम स्पष्ट होने चाहिए।
  4. भुगतान का प्रमाण रखें: हर किस्त की रसीद, बैंक ट्रांजैक्शन, समझौता और कंपनी के साथ हुई लिखित बातचीत सुरक्षित रखें।
  5. स्वतंत्र कानूनी सलाह लें: भुगतान करने से पहले जमीन के दस्तावेज किसी योग्य वकील से जांचवाएं।
  6. शिकायत दर्ज कराने में देरी न करें: विवाद होने पर संबंधित पुलिस थाने, वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों या उपयुक्त कानूनी मंच से संपर्क करें। जरूरत पड़ने पर वकील की सलाह लें।

पीड़ित सामने आएं, निष्पक्ष जांच हो

जमीन खरीदने के नाम पर कथित धोखाधड़ी के आरोप गंभीर हैं, क्योंकि इसमें आम परिवारों की वर्षों की बचत दांव पर लग सकती है। यदि किसी कंपनी ने तय शर्तों के अनुसार जमीन नहीं दी है या रकम वापस करने में अनुचित रूप से टालमटोल की है, तो मामले की निष्पक्ष जांच और पीड़ितों को कानूनी सहायता मिलना जरूरी है। स्टेट मीडिया 24 ने ऐसे मामलों से प्रभावित लोगों से संपर्क करने की अपील की है। चैनल द्वारा जारी व्हाट्सऐप हेल्पलाइन नंबर 7275701339 पर पीड़ित अपनी शिकायत, भुगतान से संबंधित जानकारी और उपलब्ध दस्तावेज साझा कर सकते हैं। दस्तावेज भेजते समय आधार नंबर, बैंक खाते की पूरी जानकारी और अन्य संवेदनशील निजी विवरण सार्वजनिक रूप से साझा करने से बचें। कानपुर पुलिस से मांग है कि जमीन और प्लॉट से जुड़े विवादों में प्राप्त शिकायतों की तथ्यों के आधार पर जांच की जाए और जहां अपराध के साक्ष्य मिलें, वहां कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए। साथ ही, संबंधित कंपनियों को भी अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना चाहिए।

सवाल यही है—क्या आम आदमी की जीवनभर की कमाई से जुड़ी ऐसी शिकायतों की निष्पक्ष जांच होगी और पीड़ितों को न्याय मिल पाएगा? इसका जवाब जांच, उपलब्ध साक्ष्यों और कानून के अनुसार की जाने वाली कार्रवाई से ही सामने आएगा।

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