मुंबई/गोवा। हिंदी और मराठी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का 75 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। 8 अक्टूबर 2026 को उनके निधन की खबर सामने आने के बाद फिल्म जगत और उनके प्रशंसकों में शोक की लहर दौड़ गई। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, अभिनेता गोवा के डोना पाउला स्थित अपने आवास पर बेहोश पाए गए थे। इसके बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। शुरुआती रिपोर्टों में निधन की वजह गंभीर कार्डियक अरेस्ट बताई गई। उनके बेटे मल्हार पाटेकर ने भी निधन की पुष्टि की। नाना पाटेकर का जाना भारतीय सिनेमा के लिए बड़ी क्षति है। वह उन कलाकारों में शामिल थे, जिन्होंने अपनी अलग अभिनय शैली, दमदार आवाज, प्रभावशाली संवाद अदायगी और किरदारों में गहराई के दम पर दर्शकों के बीच खास पहचान बनाई। उन्होंने अपने लंबे करियर में गंभीर, भावनात्मक, हास्य और नकारात्मक भूमिकाएं निभाकर साबित किया कि एक कलाकार अपनी प्रतिभा से हर तरह के किरदार को यादगार बना सकता है।
गमन’ से शुरू हुआ सफर, ‘परिंदा’ से मिली बड़ी पहचान
नाना पाटेकर का असली नाम विश्वनाथ पाटेकर था। उनका जन्म 1951 में महाराष्ट्र में हुआ था। उन्होंने रंगमंच से अपने अभिनय सफर की शुरुआत की और आगे चलकर हिंदी तथा मराठी सिनेमा में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। वर्ष 1978 में आई फिल्म ‘गमन’ से उन्होंने हिंदी फिल्मों में कदम रखा। शुरुआती दौर में उन्होंने कई फिल्मों में काम किया, लेकिन उनकी प्रतिभा को व्यापक पहचान मिलने में कुछ समय लगा। वर्ष 1989 में रिलीज हुई फिल्म ‘परिंदा’ उनके करियर की महत्वपूर्ण फिल्मों में शामिल रही। इस फिल्म में उनके अभिनय को काफी सराहना मिली और उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला। इस उपलब्धि ने उन्हें हिंदी सिनेमा के प्रतिभाशाली अभिनेताओं की अग्रिम पंक्ति में स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई। इसके बाद नाना पाटेकर ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’, ‘तिरंगा’, ‘क्रांतिवीर’, ‘खामोशी: द म्यूजिकल’, ‘अग्नि साक्षी’, ‘अब तक छप्पन’, ‘अपहरण’ और ‘राजनीति’ जैसी फिल्मों में अलग-अलग तरह के किरदार निभाए। उनकी भूमिकाओं में एक खास तरह की तीव्रता दिखाई देती थी, जो दर्शकों को कहानी और किरदार से जोड़ देती थी।
क्रांतिवीर’ और ‘तिरंगा’ ने दर्शकों के दिलों में बनाई जगह
नाना पाटेकर की लोकप्रिय फिल्मों की बात हो और ‘क्रांतिवीर’ का जिक्र न हो, ऐसा संभव नहीं है। इस फिल्म में उनके अभिनय और संवाद अदायगी ने दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ी। फिल्म में उनके किरदार ने सामाजिक अन्याय, व्यवस्था और आम आदमी के सवालों को प्रभावशाली तरीके से सामने रखा। तिरंगा’ में भी उन्होंने अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराई। गंभीर और आक्रामक भूमिकाओं के अलावा उन्होंने हास्य और भावनात्मक किरदारों में भी अपनी प्रतिभा दिखाई। यही वजह रही कि वह केवल एक तरह की भूमिकाओं तक सीमित नहीं रहे। फिल्म ‘वेलकम’ में उदय शेट्टी का किरदार उनके करियर के लोकप्रिय हास्य किरदारों में शामिल हुआ। इस फिल्म ने युवा दर्शकों के बीच भी उनकी लोकप्रियता बढ़ाई। गंभीर अभिनय के लिए पहचाने जाने वाले नाना पाटेकर ने हास्य भूमिकाओं में भी अपनी अलग छाप छोड़ी।
अभिनय के साथ निर्देशन और लेखन में भी दिखाई प्रतिभा
नाना पाटेकर केवल अभिनेता ही नहीं थे, बल्कि उन्होंने निर्देशन और लेखन के क्षेत्र में भी काम किया। वर्ष 1991 में आई ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ उनके निर्देशन से जुड़ी महत्वपूर्ण फिल्म थी। इस फिल्म में उन्होंने अभिनय भी किया। उनकी रचनात्मक रुचि केवल पर्दे पर किरदार निभाने तक सीमित नहीं थी, बल्कि वह कहानी, उसके सामाजिक संदर्भ और किरदार की आंतरिक भावनाओं पर भी विशेष ध्यान देते थे। उनकी अभिनय शैली की खासियत यह थी कि वह अपने किरदारों को जरूरत से ज्यादा नाटकीय बनाने के बजाय उनमें वास्तविकता का पुट रखते थे। उनके चेहरे के भाव, आवाज का उतार-चढ़ाव और संवादों की प्रस्तुति कई दृश्यों को यादगार बना देती थी।
राष्ट्रीय पुरस्कार और पद्मश्री से हुए सम्मानित
नाना पाटेकर को उनके उल्लेखनीय अभिनय के लिए कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। उन्हें तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिले। भारतीय सिनेमा में उनके योगदान के लिए उन्हें वर्ष 2013 में पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया। उनके पुरस्कार उनकी प्रतिभा और लंबे समय तक फिल्म जगत में दिए गए योगदान की पहचान हैं। उन्होंने हिंदी और मराठी दोनों भाषाओं की फिल्मों में काम किया और विभिन्न तरह के किरदारों के माध्यम से अपनी अभिनय क्षमता का परिचय दिया। उनकी लोकप्रियता का एक कारण यह भी था कि वह बड़े सितारे की छवि के बजाय अपने अभिनय को प्राथमिकता देते थे।
कारगिल युद्ध के दौरान सेना के जवानों के साथ बिताया समय
नाना पाटेकर का भारतीय सेना के प्रति सम्मान भी अक्सर चर्चा में रहा। वर्ष 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान वह सेना के जवानों के संपर्क में रहे और उन्होंने करीब 60 दिन सैनिकों के साथ बिताए थे। इस प्रसंग को उनके जीवन के उन पहलुओं में गिना जाता है, जो उनके फिल्मी व्यक्तित्व से अलग उनकी सामाजिक और राष्ट्रीय प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं। उनकी पहचान केवल फिल्मों तक सीमित नहीं थी। वह सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय रहे। महाराष्ट्र में किसानों की सहायता से जुड़े प्रयासों और नाम फाउंडेशन से उनके जुड़ाव का उल्लेख भी उनके सार्वजनिक जीवन के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में किया जाता है।
हाल के वर्षों में भी फिल्मों में रहे सक्रिय
अपने लंबे करियर के बावजूद नाना पाटेकर ने फिल्मों से दूरी नहीं बनाई। वर्ष 2025 में वह ‘हाउसफुल 5’ में नजर आए। इसके अलावा वह अपनी उम्र और अनुभव के अनुरूप विविध भूमिकाएं निभाते रहे। उनके अभिनय में समय के साथ परिपक्वता आई, लेकिन किरदारों को प्रभावशाली बनाने की उनकी क्षमता बरकरार रही। उनकी फिल्मों ने कई पीढ़ियों के दर्शकों को प्रभावित किया। पुराने दर्शकों के लिए वह गंभीर और सामाजिक विषयों पर आधारित फिल्मों के प्रभावशाली अभिनेता थे, जबकि नई पीढ़ी ने उन्हें ‘वेलकम’ जैसे मनोरंजक किरदारों के माध्यम से भी जाना।
नाना पाटेकर का जाना, सिनेमा के लिए बड़ी क्षति
नाना पाटेकर के निधन पर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और कई अन्य प्रमुख हस्तियों ने शोक व्यक्त किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके अभिनय की विशिष्टता और हिंदी तथा मराठी सिनेमा में योगदान को याद किया। उनके निधन को भारतीय फिल्म जगत के लिए बड़ी क्षति बताया गया। नाना पाटेकर ने अपने अभिनय से यह साबित किया कि किसी कलाकार की पहचान केवल उसके स्टारडम से नहीं, बल्कि उसके निभाए किरदारों और दर्शकों पर छोड़ी गई छाप से बनती है। ‘परिंदा’ से ‘क्रांतिवीर’ और ‘तिरंगा’ से ‘वेलकम’ तक उनका सफर भारतीय सिनेमा के विविध रंगों को समेटे हुए है। 75 वर्ष की उम्र में उनका जाना फिल्म जगत के एक महत्वपूर्ण अध्याय का अंत है। उनके निभाए किरदार, उनकी संवाद अदायगी और अभिनय की विशिष्ट शैली लंबे समय तक दर्शकों की यादों में बनी रहेगी।















