डेस्क रिपोर्ट
कानपुर, 3 जून। देश के प्रतिष्ठित औद्योगिक घराने सिंघानिया परिवार से जुड़े श्री बलदेव जी महाराज (टेम्पल) ट्रस्ट को लेकर करोड़ों रुपये की संपत्ति, फर्जी बैंक खाते और कथित गबन का मामला चर्चा में आ गया है। सर्व ब्राह्मण महासभा के एक प्रतिनिधिमंडल ने संगठन के राष्ट्रीय महामंत्री नरेश चन्द्र त्रिपाठी के नेतृत्व में पुलिस आयुक्त रघुवीर लाल से मुलाकात कर मामले की विस्तृत शिकायत सौंपते हुए दोषियों के विरुद्ध आपराधिक मुकदमा दर्ज करने और निष्पक्ष जांच की मांग की है। पुलिस आयुक्त ने शिकायत का संज्ञान लेते हुए जांच के निर्देश दिए हैं। प्रतिनिधिमंडल में बृजेन्द्र नाथ मिश्रा, हीरेन्द्र नाथ दीक्षित समेत कई अन्य पदाधिकारी शामिल रहे। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि ट्रस्ट की बहुमूल्य संपत्तियों के प्रबंधन में गंभीर अनियमितताएं हुई हैं, जिनसे ट्रस्ट को भारी आर्थिक नुकसान पहुंचा है।

प्रेसवार्ता में लगाए गए गंभीर आरोप
पुलिस आयुक्त से मुलाकात के बाद सिविल लाइंस स्थित एक होटल में आयोजित प्रेसवार्ता में सर्व ब्राह्मण महासभा के पदाधिकारियों ने दावा किया कि वर्ष 1942 में स्थापित श्री बलदेव जी महाराज (टेम्पल) ट्रस्ट एक सार्वजनिक धार्मिक एवं चैरिटेबल ट्रस्ट है। ट्रस्ट की आर्यनगर, कानपुर स्थित लगभग 1331 वर्गगज भूमि वर्तमान समय में करोड़ों रुपये मूल्य की बताई जा रही है। महासभा के पदाधिकारियों ने आरोप लगाया कि ट्रस्ट से जुड़े कुछ लोगों ने कथित मिलीभगत के तहत इस संपत्ति का विक्रय अनुबंध मात्र 4.88 करोड़ रुपये में कर दिया, जबकि बाजार में इसकी वास्तविक कीमत इससे कहीं अधिक बताई जा रही है। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि इस सौदे के एवज में लगभग 1.20 करोड़ रुपये की धनराशि प्राप्त की गई।
न्यायालय की अनुमति के बिना सौदे का आरोप
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि धार्मिक एवं सार्वजनिक ट्रस्ट की संपत्ति के विक्रय अथवा उससे संबंधित किसी भी बड़े वित्तीय निर्णय के लिए सक्षम न्यायालय की पूर्व अनुमति आवश्यक होती है। आरोप है कि संबंधित ट्रस्टियों ने बिना न्यायालय की अनुमति और बिना आवश्यक कानूनी प्रक्रिया पूरी किए संपत्ति के संबंध में अनुबंध कर लिया। महासभा का कहना है कि यदि जांच में यह आरोप सही साबित होते हैं तो यह केवल वित्तीय अनियमितता नहीं बल्कि धार्मिक ट्रस्ट की संपत्ति और उसके हितों को नुकसान पहुंचाने का गंभीर मामला माना जाएगा।
फर्जी बैंक खाते से करोड़ों के लेन-देन का आरोप
मामले का सबसे गंभीर पहलू कथित फर्जी बैंक खाते से जुड़ा बताया जा रहा है। प्रेसवार्ता में दावा किया गया कि संपत्ति सौदे से प्राप्त लगभग 1.20 करोड़ रुपये की धनराशि दिल्ली स्थित एक बैंक में ट्रस्ट के नाम पर खोले गए खाते में जमा कराई गई। आरोप है कि यह खाता ट्रस्ट के एक ट्रस्टी के कथित जाली और कूटरचित हस्ताक्षरों के आधार पर खोला गया था। शिकायतकर्ताओं के अनुसार बाद में इस खाते से धनराशि विभिन्न निजी खातों में स्थानांतरित कर दी गई, जिससे ट्रस्ट को आर्थिक नुकसान पहुंचा। महासभा के पदाधिकारियों का आरोप है कि पूरे प्रकरण में सुनियोजित तरीके से वित्तीय अनियमितताएं की गईं और ट्रस्ट की संपत्ति एवं धनराशि का दुरुपयोग हुआ।
पहले से दर्ज है एफआईआर
प्रेसवार्ता में यह भी बताया गया कि कथित फर्जी बैंक खाते के संबंध में वर्ष 2024 में थाना फजलगंज में एफआईआर संख्या 113/2024 दर्ज की जा चुकी है। इस मामले में कई लोगों को नामजद किया गया था और पुलिस द्वारा जांच भी की गई। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि विवेचना के दौरान फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (एफएसएल) की रिपोर्ट में संबंधित हस्ताक्षरों के फर्जी होने की पुष्टि हुई थी। उनका कहना है कि पुलिस इस मामले में न्यायालय में आरोपपत्र भी दाखिल कर चुकी है, जिससे जालसाजी और कूटरचना के आरोपों को और बल मिलता है। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि जांच एजेंसियों और न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से ही हो सकेगी।
आर्थिक अपराध शाखा से जांच की मांग
सर्व ब्राह्मण महासभा ने पूरे मामले की जांच आर्थिक अपराध शाखा (EOW) या किसी अन्य सक्षम एजेंसी से कराए जाने की मांग की है। उनका कहना है कि मामले में संपत्ति सौदे, बैंक खातों, धनराशि के हस्तांतरण और ट्रस्ट प्रशासन से जुड़े सभी पहलुओं की गहन जांच आवश्यक है। महासभा का तर्क है कि निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच के बिना सच्चाई सामने आना मुश्किल होगा। इसलिए वित्तीय लेन-देन की जांच विशेषज्ञ एजेंसी द्वारा कराई जानी चाहिए।
धार्मिक ट्रस्टों की पारदर्शिता पर उठे सवाल
यह मामला अब केवल एक संपत्ति विवाद तक सीमित नहीं रह गया है। इसके बहाने धार्मिक एवं चैरिटेबल ट्रस्टों की संपत्तियों के प्रबंधन, वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर भी बहस तेज हो गई है। सामाजिक संगठनों का कहना है कि धार्मिक ट्रस्ट जनता की आस्था से जुड़े होते हैं, इसलिए उनके संचालन में पारदर्शिता और वित्तीय अनुशासन सुनिश्चित किया जाना बेहद आवश्यक है। यदि जांच में आरोप सही साबित होते हैं तो यह प्रदेश के चर्चित ट्रस्ट विवादों में से एक माना जाएगा।
जांच पर टिकी निगाहें
फिलहाल पुलिस आयुक्त द्वारा जांच के निर्देश दिए जाने के बाद सभी पक्षों की निगाहें आगामी कार्रवाई पर टिकी हुई हैं। जांच के निष्कर्ष ही यह स्पष्ट करेंगे कि शिकायतकर्ताओं द्वारा लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है और संबंधित लोगों की क्या भूमिका रही। जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक आरोपों को आरोप के रूप में ही देखा जाएगा। हालांकि मामले ने कानपुर से लेकर बांदा और प्रदेश के अन्य हिस्सों में भी चर्चा का विषय बना दिया है।














