कानपुर। देशभर में विजयादशमी का पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। इस दिन जगह-जगह रावण के पुतलों का दहन किया जाता है और भगवान श्रीराम की विजय का उत्सव मनाया जाता है। लेकिन उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में एक ऐसा मंदिर भी है, जहां दशहरे के दिन लंकापति रावण की पूजा-अर्चना की जाती है। यहां श्रद्धालु रावण की शिवभक्ति, विद्वता और ज्ञान को याद करते हुए विशेष पूजा करते हैं। इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके कपाट साल में केवल एक दिन, विजयादशमी के अवसर पर खोले जाते हैं। कानपुर के शिवाला इलाके में स्थित कैलाश मंदिर परिसर के अंदर दशानन मंदिर बना हुआ है। यहां रावण की लगभग पांच फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह मंदिर करीब 135 से 150 साल पुराना है। दशहरे के दिन मंदिर के कपाट खुलते ही श्रद्धालुओं की आवाजाही शुरू हो जाती है। लोग प्रतिमा के दर्शन करते हैं, पूजा-अर्चना करते हैं और अपनी मनोकामनाओं के लिए प्रार्थना करते हैं। यह मंदिर दशहरे की परंपरा का एक अलग पहलू सामने लाता है। जहां एक ओर रावण के अहंकार और अधर्म के अंत को याद किया जाता है, वहीं इस मंदिर में उसकी विद्वता और भगवान शिव के प्रति भक्ति को सम्मान देने की मान्यता है।
उन्नाव के महाराज गुरु प्रसाद शुक्ल से जुड़ी है मंदिर की मान्यता
स्थानीय मान्यताओं के मुताबिक, दशानन मंदिर का निर्माण उन्नाव के महाराज गुरु प्रसाद शुक्ल ने करवाया था। बताया जाता है कि वह भगवान शिव के परम भक्त थे। रावण की शिवभक्ति और उसके विद्वान होने की मान्यता से प्रभावित होकर उन्होंने मंदिर परिसर में उसकी प्रतिमा को प्रहरी के रूप में स्थापित करवाया था। धार्मिक मान्यताओं में रावण को एक ओर लंका का शक्तिशाली राजा और भगवान शिव का उपासक माना जाता है, तो दूसरी ओर रामायण में उसके अहंकार और माता सीता के हरण के कारण उसके पतन का वर्णन मिलता है। इसी वजह से दशहरा भारतीय परंपरा में बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है। कानपुर के दशानन मंदिर में रावण की पूजा का आधार उसकी शिवभक्ति और विद्वता से जुड़ी स्थानीय आस्था बताई जाती है। हालांकि, मंदिर के निर्माण की सटीक तारीख और उससे जुड़े ऐतिहासिक विवरणों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध जानकारी से नहीं होती। मंदिर की प्राचीनता को लेकर स्थानीय स्तर पर अलग-अलग अनुमान बताए जाते हैं।
साल में सिर्फ एक दिन खुलते हैं मंदिर के कपाट
दशानन मंदिर की सबसे खास परंपरा इसके कपाट खुलने से जुड़ी है। बताया जाता है कि मंदिर के कपाट साल में केवल विजयादशमी के दिन खोले जाते हैं। बाकी 364 दिन रावण की प्रतिमा कपड़े से ढकी रहती है। यही विशेषता इस मंदिर को कानपुर के अन्य धार्मिक स्थलों से अलग पहचान देती है। विजयादशमी की सुबह कपाट खुलने के बाद प्रतिमा की पूजा की तैयारियां शुरू होती हैं। सबसे पहले रावण की प्रतिमा का दुग्धाभिषेक किया जाता है। इसके बाद श्रृंगार और अन्य धार्मिक अनुष्ठान संपन्न किए जाते हैं। मंदिर में दर्शन करने पहुंचने वाले श्रद्धालु इस अवसर को विशेष धार्मिक महत्व देते हैं। सुबह से ही मंदिर परिसर में भक्तों का आना-जाना शुरू हो जाता है। लोग रावण की प्रतिमा के सामने सिर झुकाते हैं और पूजा में भाग लेते हैं। स्थानीय लोगों के लिए यह परंपरा वर्षों से चली आ रही आस्था का हिस्सा है।
तरोई के फूल चढ़ाकर जलाए जाते हैं सरसों के तेल के दीप
दशानन मंदिर में पूजा की कुछ विशेष परंपराएं भी बताई जाती हैं। श्रद्धालु यहां तरोई के फूल चढ़ाते हैं और सरसों के तेल के दीप जलाकर पूजा-अर्चना करते हैं। इस दौरान मंदिर परिसर में धार्मिक जयकारे भी लगाए जाते हैं। श्रद्धालु लंकापति रावण के नाम का जयघोष करते हुए अपनी आस्था प्रकट करते हैं। स्थानीय मान्यता है कि यहां पूजा करने से ज्ञान, बुद्धि और शक्ति की प्राप्ति होती है। कुछ लोगों का यह भी विश्वास है कि छिन्नमस्तिका देवी की पूजा रावण की पूजा के बिना अधूरी मानी जाती है। ये मान्यताएं मंदिर की स्थानीय धार्मिक परंपरा का हिस्सा हैं। मंदिर में पूजा करने आने वाले श्रद्धालुओं के लिए विजयादशमी का दिन खास महत्व रखता है, क्योंकि उन्हें साल में केवल एक बार ही प्रतिमा के खुले दर्शन का अवसर मिलता है। इस वजह से दशहरे के दिन यहां की धार्मिक गतिविधियां विशेष आकर्षण का केंद्र बन जाती हैं।
शाम को रावण दहन के साथ फिर एक साल के लिए बंद हो जाते हैं कपाट
दशानन मंदिर की एक और विशेषता इसके कपाट बंद करने की परंपरा है। दिनभर पूजा-अर्चना और दर्शन के बाद शाम होते ही मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। यह समय शहर में होने वाले रावण दहन के आयोजनों से भी जुड़ा है। जैसे-जैसे शाम ढलती है, शहर के अलग-अलग इलाकों में रावण के पुतलों के दहन की तैयारियां पूरी होने लगती हैं। वहीं, दशानन मंदिर में पूजा की परंपरा अपने समापन की ओर बढ़ती है। मंदिर के कपाट बंद होने के बाद श्रद्धालुओं को अगले विजयादशमी पर्व तक इंतजार करना पड़ता है। इस तरह एक ही दिन में रावण से जुड़ी दो अलग-अलग परंपराएं देखने को मिलती हैं। एक तरफ रावण के अहंकार और अधर्म के अंत का प्रतीकात्मक उत्सव होता है, तो दूसरी तरफ उसकी विद्वता और शिवभक्ति के प्रति सम्मान प्रकट किया जाता है।
दशानन मंदिर में दिखती है दशहरे की अलग धार्मिक परंपरा
कानपुर का दशानन मंदिर स्थानीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं की विविधता का उदाहरण है। यहां होने वाली पूजा यह दर्शाती है कि धार्मिक कथाओं से जुड़े पात्रों को अलग-अलग संदर्भों में देखा जाता है। रावण का चरित्र भी इसका उदाहरण है—रामायण में उसके अहंकार और अधर्म का अंत विजयादशमी का केंद्रीय संदेश है, जबकि कुछ परंपराओं में उसकी विद्वता और शिवभक्ति को याद किया जाता है। इस मंदिर की विशेषता केवल रावण की प्रतिमा या साल में एक दिन खुलने वाले कपाट तक सीमित नहीं है। यह दशहरे के अवसर पर लोगों की आस्था, परंपरा और धार्मिक मान्यताओं के विविध रूपों को भी सामने लाता है। कानपुर के शिवाला स्थित दशानन मंदिर को लेकर स्थानीय लोगों में वर्षों से चली आ रही मान्यताएं इस स्थान को अलग पहचान देती हैं। विजयादशमी पर यहां पहुंचने वाले श्रद्धालु पूजा-अर्चना करते हैं और फिर मंदिर के कपाट बंद होने के बाद अगले साल का इंतजार करते हैं।
निष्कर्ष: कानपुर का दशानन मंदिर दशहरे की एक अनोखी परंपरा का प्रतीक है। यहां साल में सिर्फ एक दिन रावण की प्रतिमा के दर्शन और पूजा का अवसर मिलता है। एक ओर देशभर में रावण दहन के जरिए अहंकार और अधर्म के अंत का संदेश दिया जाता है, तो दूसरी ओर इस मंदिर में रावण की शिवभक्ति और विद्वता से जुड़ी स्थानीय मान्यताओं के अनुसार पूजा की जाती है।















