खखरेरू/फतेहपुर। धाता विकासखंड के यमुना तटवर्ती कोट गांव में स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को लेकर ग्रामीणों में नाराजगी है। ग्रामीणों का आरोप है कि अस्पताल में तैनात चिकित्सक के नियमित रूप से मौजूद न रहने के कारण मरीजों को इलाज के लिए परेशान होना पड़ रहा है। उनका कहना है कि डॉक्टर की गैरमौजूदगी में मरीजों को कभी फार्मासिस्ट तो कभी लैब टेक्नीशियन देखने को मजबूर हैं। कोट प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र आसपास के कई गांवों के लोगों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं का महत्वपूर्ण केंद्र है। ग्रामीणों के अनुसार करीब पांच हजार से अधिक आबादी इस स्वास्थ्य केंद्र पर निर्भर है। सामान्य बीमारी से लेकर बुखार, सर्दी-जुकाम और मच्छरजनित बीमारियों से पीड़ित लोग यहां इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं। लेकिन डॉक्टर के उपलब्ध न होने पर उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ता है।

डॉक्टर नहीं मिलतीं तो लौट जाते हैं मरीज
ग्रामीणों का कहना है कि स्वास्थ्य केंद्र पर आने वाले मरीजों को सबसे बड़ी समस्या डॉक्टर की उपलब्धता को लेकर होती है। कई बार मरीज सुबह से अस्पताल पहुंचते हैं, लेकिन चिकित्सक के नहीं मिलने पर उन्हें निराश होकर वापस लौटना पड़ता है। ग्रामीणों के मुताबिक, कोट गांव से दूसरा अस्पताल करीब 10 से 12 किलोमीटर दूर है। ऐसे में बुजुर्ग, महिलाएं, बच्चे और गंभीर रूप से बीमार मरीजों को दूसरे अस्पताल तक ले जाना आसान नहीं है। बरसात के मौसम में रास्तों की स्थिति और खराब होने के कारण समस्या और बढ़ जाती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर नियमित रूप से उपलब्ध रहें तो ग्रामीणों को छोटी-छोटी बीमारियों के लिए दूर नहीं जाना पड़ेगा।

लैब टेक्नीशियन के मरीज देखने का आरोप
ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि डॉक्टर की अनुपस्थिति में मरीजों को देखने की जिम्मेदारी कभी फार्मासिस्ट तो कभी लैब टेक्नीशियन संभालते नजर आते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि मरीज बीमारी बताकर उपचार और दवा की उम्मीद करते हैं, लेकिन डॉक्टर की गैरमौजूदगी में उन्हें दूसरे कर्मचारियों पर निर्भर रहना पड़ता है। लोगों ने सवाल उठाया कि यदि सरकारी अस्पताल में डॉक्टर की तैनाती है तो उनकी नियमित उपस्थिति भी सुनिश्चित होनी चाहिए। ग्रामीणों के मुताबिक स्वास्थ्य केंद्र का संचालन निर्धारित व्यवस्था के अनुसार होना चाहिए, ताकि मरीजों को सही समय पर चिकित्सकीय सलाह मिल सके। हालांकि, डॉक्टर की अनुपस्थिति और अन्य कर्मचारियों द्वारा मरीजों को देखने के आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। स्वास्थ्य विभाग की जांच के बाद ही स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो सकेगी।
स्वास्थ्य मेले में भी डॉक्टर के नहीं मिलने की शिकायत
ग्रामीणों ने रविवार को आयोजित होने वाले स्वास्थ्य मेले को लेकर भी शिकायत की है। उनका कहना है कि स्वास्थ्य मेले जैसे महत्वपूर्ण आयोजन का उद्देश्य ग्रामीणों को उनके क्षेत्र में स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना है, लेकिन यदि इस दौरान भी डॉक्टर मौजूद न रहें तो आयोजन का उद्देश्य प्रभावित होता है। ग्रामीणों ने मालती देवी, नियाज, मोतहा, ऐनम, पलक खान, अबू रहमान, अब्दुल वाजिद, खलीफा और रामसवारे समेत कई मरीजों की परेशानी का हवाला देते हुए अस्पताल की व्यवस्था सुधारने की मांग की। लोगों का कहना है कि अस्पताल में आने वाले मरीजों को यह भरोसा होना चाहिए कि जरूरत पड़ने पर उन्हें डॉक्टर उपलब्ध मिलेंगे।

दवाइयों के रखरखाव को लेकर भी सवाल
स्वास्थ्य केंद्र की व्यवस्था को लेकर ग्रामीणों ने केवल डॉक्टर की अनुपस्थिति ही नहीं, बल्कि दवाइयों के रखरखाव पर भी सवाल उठाए हैं। ग्रामीणों के अनुसार अस्पताल में कुछ दवाइयां व्यवस्थित तरीके से रखी हुई नजर नहीं आतीं और खिड़कियों समेत अन्य स्थानों पर दवाइयां बिखरी दिखाई देती हैं। लोगों ने मांग की है कि स्वास्थ्य विभाग अस्पताल में उपलब्ध दवाइयों के स्टॉक और रखरखाव की जांच कराए। ग्रामीणों का कहना है कि दवाइयों को सुरक्षित और व्यवस्थित तरीके से रखा जाना चाहिए, ताकि जरूरत पड़ने पर मरीजों को आसानी से दवा उपलब्ध हो सके।
परिसर में उगी झाड़ियों से सफाई व्यवस्था पर सवाल
ग्रामीणों के मुताबिक स्वास्थ्य केंद्र के परिसर में भी साफ-सफाई का पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है। अस्पताल परिसर में बड़ी-बड़ी झाड़ियां उगने की बात कही गई है। बरसात के मौसम में झाड़ियों और गंदगी के कारण मच्छरों का प्रकोप बढ़ने की आशंका भी रहती है। ग्रामीणों ने कहा कि जिस स्वास्थ्य केंद्र में लोग बीमारी का इलाज कराने आते हैं, वहां स्वच्छता व्यवस्था बेहतर होनी चाहिए। अस्पताल परिसर की नियमित सफाई और झाड़ियों की कटाई कराई जानी चाहिए।
कागजों में स्टाफ, जमीन पर व्यवस्था कमजोर होने का आरोप
स्थानीय लोगों का कहना है कि स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर, फार्मासिस्ट, लैब टेक्नीशियन और सहायक समेत स्टाफ की तैनाती है, लेकिन अस्पताल में पूरा स्टाफ नियमित रूप से मौजूद नहीं दिखाई देता। ग्रामीणों का आरोप है कि कर्मचारियों की अनुपस्थिति के कारण स्वास्थ्य सेवाओं का पूरा लाभ लोगों को नहीं मिल पा रहा है। उन्होंने स्वास्थ्य विभाग से कर्मचारियों की उपस्थिति की नियमित जांच कराने की मांग की है। लोगों का कहना है कि यदि कर्मचारियों की ड्यूटी और उपस्थिति की निगरानी नियमित रूप से की जाए तो अस्पताल की व्यवस्था में काफी सुधार हो सकता है।
निजी अस्पतालों का खर्च उठाने को मजबूर ग्रामीण
सरकारी स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर उपलब्ध नहीं मिलने की स्थिति में ग्रामीणों को निजी अस्पतालों और चिकित्सकों का सहारा लेना पड़ता है। ग्रामीणों का कहना है कि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए निजी इलाज का खर्च उठाना मुश्किल होता है। कुछ ग्रामीणों ने यह भी कहा कि मजबूरी में लोग स्थानीय स्तर पर इलाज कराने चले जाते हैं। इससे उनके स्वास्थ्य पर अतिरिक्त जोखिम हो सकता है। ग्रामीणों की मांग है कि सरकारी अस्पताल में ही पर्याप्त और नियमित स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जाएं।
ग्रामीणों ने की नियमित निरीक्षण की मांग
स्थानीय लोगों ने स्वास्थ्य विभाग से कोट प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का नियमित निरीक्षण कराने की मांग की है। ग्रामीण चाहते हैं कि अस्पताल में डॉक्टर और अन्य कर्मचारियों की उपस्थिति की जांच हो, दवाइयों के रखरखाव को देखा जाए और परिसर की साफ-सफाई व्यवस्था दुरुस्त कराई जाए। ग्रामीणों का कहना है कि केवल कागजों पर स्टाफ की तैनाती पर्याप्त नहीं है। मरीजों को वास्तविक रूप से स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ मिलना चाहिए।
सीएमओ ने जांच का दिया आश्वासन
मामले में सीएमओ उदय सिंह ने कहा कि शिकायत की जांच कराई जाएगी। उन्होंने कहा कि जांच में यदि किसी प्रकार की लापरवाही सामने आती है तो संबंधित के खिलाफ आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। सीएमओ के बयान के बाद अब ग्रामीणों को उम्मीद है कि स्वास्थ्य विभाग मामले की जांच कर कोट प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की व्यवस्थाओं में सुधार कराएगा। फिलहाल ग्रामीणों की शिकायतों और आरोपों की विभागीय जांच होना बाकी है। जांच के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि डॉक्टर की अनुपस्थिति, कर्मचारियों की कार्यप्रणाली, दवाइयों के रखरखाव और साफ-सफाई को लेकर लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है। ग्रामीणों की सबसे बड़ी मांग यही है कि कोट प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर डॉक्टर नियमित रूप से उपलब्ध रहें, ताकि पांच हजार से अधिक ग्रामीणों को इलाज के लिए 10 से 12 किलोमीटर दूर दूसरे अस्पतालों का रुख न करना पड़े।






