देशभर में किडनी रैकेट का बड़ा खुलासा, 50 से ज्यादा अस्पताल जांच के घेरे में

डोनर से लाखों में सौदा, मरीज से करोड़ों की वसूली; जांच में कमीशन नेटवर्क का बड़ा खुलासा

सवांददाता-सुनील तिवारी

कानपुर में उजागर हुए किडनी रैकेट ने पूरे स्वास्थ्य तंत्र को हिला दिया है। शुरुआती जांच में जहां चार अस्पतालों के नाम सामने आए थे, वहीं अब 50 से ज्यादा निजी अस्पताल पुलिस और स्वास्थ्य विभाग के रडार पर हैं। मामले में लखनऊ और मेरठ के चार डॉक्टरों के खिलाफ लुक आउट नोटिस जारी किया गया है। पुलिस की तीन विशेष टीमें उनकी तलाश में अलग-अलग शहरों में दबिश दे रही हैं।इस रैकेट के तार केवल कानपुर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि कोलकाता, दिल्ली, बिहार और यहां तक कि साउथ अफ्रीका तक फैले हुए हैं।पुलिस को संदेह है कि यह सिंडिकेट लंबे समय से सक्रिय था और बड़े पैमाने पर अवैध ट्रांसप्लांट करा रहा था। गिरफ्तार डॉक्टरों और अस्पताल संचालकों के मोबाइल फोन की कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर) खंगाली जा रही है, जिससे नेटवर्क के और बड़े खुलासे होने की उम्मीद है।29 मार्च की रात आयुष नामक युवक के ऑपरेशन से इस काले धंधे का पर्दाफाश हुआ। इसके बाद पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की संयुक्त टीम ने आहूजा हॉस्पिटल, मेड लाइफ और प्रिया हॉस्पिटल में छापेमारी की। यहां किडनी डोनर और रिसीवर दोनों संदिग्ध हालत में मिले।

                             अंगों के सौदे में करोड़ों का खेल, जांच में चौंकाने वाले खुलासे

इस रैकेट का सबसे चौंकाने वाला पहलू इसकी ‘कमीशन चेन’ है। जांच में सामने आया कि डोनर आयुष से महज 6 लाख रुपये में किडनी का सौदा किया गया, जबकि उसे केवल साढ़े तीन लाख रुपये ही दिए गए। दूसरी ओर, मरीज से 60 लाख रुपये तक वसूले गए।दलाल शिवम अग्रवाल इस पूरे नेटवर्क का अहम कड़ी था, जो सोशल मीडिया और टेलीग्राम ग्रुप के जरिए डोनर तलाशता था। आयुष, जो बिहार के समस्तीपुर का रहने वाला और देहरादून में एमबीए का छात्र है, को भी इसी तरह फंसाया गया। उसे बड़े-बड़े नामों और उदाहरणों के जरिए मानसिक रूप से तैयार किया गया।पैसों के बंटवारे में भी पूरा सिस्टम सेट था—कुछ रकम अस्पतालों को, कुछ दलालों को और बाकी मास्टरमाइंड तक पहुंचती थी। यही लालच और विवाद इस पूरे रैकेट के खुलासे की वजह बना।पुलिस पूछताछ में यह भी सामने आया कि डोनर और रिसीवर को अलग-अलग अस्पतालों में भर्ती कर उनकी पहचान छिपाई जाती थी और फर्जी मेडिकल कारणों का हवाला दिया जाता था।

                          सिस्टम पर बड़े सवाल, कैसे फैला इंटरनेशनल सिंडिकेट?

इस पूरे मामले ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर गैंग लोगों को कैसे टारगेट करता था? मरीजों और डोनर्स तक पहुंचने का नेटवर्क कितना बड़ा था? और सबसे अहम कानपुर जैसे शहर को इस अवैध कारोबार का केंद्र क्यों बनाया गया?जांच में सामने आया है कि गैंग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, व्हाट्सएप, फेसबुक, इंस्टाग्राम और डार्कवेब के जरिए अपना नेटवर्क संचालित करता था। बड़े अस्पतालों के बाहर किडनी मरीजों को टारगेट किया जाता था और उन्हें सस्ते इलाज का झांसा देकर जाल में फंसाया जाता था।कानपुर की बेहतर कनेक्टिविटी रेल और एयर नेटवर्क को भी इस रैकेट ने अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया। डोनर और रिसीवर को आसानी से एक शहर से दूसरे शहर या विदेश तक पहुंचाया जाता था।फिलहाल पुलिस की टीमें फरार डॉक्टरों की तलाश में जुटी हैं और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों से भी संपर्क किया जा रहा है। अधिकारियों का दावा है कि जल्द ही इस सिंडिकेट से जुड़े और बड़े नाम सामने आएंगे, जिससे पूरे नेटवर्क की जड़ तक पहुंचा जा सकेगा।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here