संवाददता-महेश कुमार| लखनऊ
उत्तर प्रदेश की सियासत में निषाद समाज को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। इसी कड़ी में समाजवादी पार्टी (सपा) ने बड़ा कदम उठाते हुए फूलन देवी की बहन रुक्मिणी देवी को महिला सभा की कमान सौंप दी है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव का यह फैसला साफ संकेत देता है कि पार्टी मिशन-2027 को ध्यान में रखते हुए निषाद वोट बैंक को मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है।
पुराना फार्मूला, नई रणनीति
अखिलेश यादव का यह कदम उस दौर की याद दिलाता है जब मुलायम सिंह यादव ने फूलन देवी को पार्टी में शामिल कर निषाद, केवट, बिंद और मल्लाह समाज को बड़े पैमाने पर सपा से जोड़ा था। अब उसी सामाजिक समीकरण को फिर से साधने की कोशिश की जा रही है।
भाजपा की मजबूत पकड़
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, 2017 के बाद भाजपा ने गैर-यादव ओबीसी रणनीति के तहत निषाद समाज में अपनी पकड़ मजबूत की है। निषाद पार्टी के डॉ. संजय निषाद के एनडीए में शामिल होने से भाजपा को बड़ा फायदा मिला। 2022 विधानसभा चुनाव में निषाद पार्टी के 11 विधायक जीतकर आए, जिससे इस वर्ग में भाजपा की स्थिति मजबूत हुई। साथ ही, साध्वी निरंजन ज्योति जैसे नेताओं को आगे कर भाजपा ने इस समाज को साधने की कोशिश की है।
2024 में सपा का फोकस
लोकसभा चुनाव 2024 में सपा ने निषाद समाज को ज्यादा टिकट देकर इस वर्ग को साधने की पहल की थी। इसका असर भी देखने को मिला और पार्टी के दो सांसद इसी समाज से जीतकर संसद पहुंचे।
2027 की तैयारी तेज
अब रुक्मिणी देवी को अहम जिम्मेदारी देकर सपा इस समर्थन को और मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ा रही है। सियासी जानकारों का मानना है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में निषाद समाज निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
तेज होगा सियासी मुकाबला
ऐसे में साफ है कि आने वाले समय में सपा और भाजपा के बीच निषाद वोट बैंक को लेकर सियासी जंग और तेज होने वाली है। दोनों ही दल इस वर्ग को अपने पाले में रखने के लिए लगातार रणनीति बना रहे हैं।
















