शंकराचार्य की ‘चतुरंगिणी सेना’ का ऐलान, 2.18 लाख सदस्यों का लक्ष्य

टोको-रोको-ठोको’ मॉडल पर काम करेगा संगठन, संत-विद्वान-अधिवक्ता और स्वयंसेवक होंगे शामिल

संवाददाता-पवन मिश्रा

वाराणसी। काशी से एक बड़ी धार्मिक-संगठनात्मक पहल सामने आई है। ज्योतिष्पीठाधीश्वर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने ‘शंकराचार्य चतुरंगिणी सेना’ के गठन की घोषणा करते हुए इसे सनातन धर्म की रक्षा और सामाजिक एकजुटता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है। इस संगठन के जरिए देशभर में व्यापक स्तर पर लोगों को जोड़ने की योजना बनाई गई है।

शंकराचार्य घाट स्थित श्रीविद्यामठ में आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने बताया कि इस सेना के संचालन के लिए ‘शंकराचार्य चतुरंगिणी सभा’ का गठन किया गया है। संगठन में करीब 2 लाख 18 हजार 700 सदस्यों को जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है। इसके साथ ही 27 पदाधिकारियों की सूची भी जारी कर दी गई है, जो अलग-अलग जिम्मेदारियां संभालेंगे।

शंकराचार्य ने संगठन की कार्यप्रणाली को स्पष्ट करते हुए ‘टोको, रोको और ठोको’ का तीन-स्तरीय मॉडल पेश किया। उन्होंने कहा कि किसी भी मुद्दे पर पहले संवाद और चेतावनी दी जाएगी, इसके बाद शांतिपूर्ण विरोध किया जाएगा और जरूरत पड़ने पर कानूनी प्रक्रिया के तहत कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने विशेष रूप से स्पष्ट किया कि ‘ठोको’ शब्द का अर्थ किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं है, बल्कि यह संवैधानिक दायरे में रहकर कार्रवाई करने का प्रतीक है।

संगठन की संरचना को चार प्रमुख अंगों और करीब 20 विभागों में बांटा गया है। इसमें संत समाज, विद्वान, अधिवक्ता और मीडिया से जुड़े लोग अहम भूमिका निभाएंगे। इसके अलावा विभिन्न स्तरों पर स्वयंसेवकों की टीम भी बनाई जाएगी, जो जमीनी स्तर पर कार्य करेगी।

इस सेना का एक विशेष स्वरूप भी तय किया गया है। इसके सदस्य पीले वस्त्र पहनेंगे और परशु (फरसा) को प्रतीक के रूप में धारण करेंगे। इसे संगठन की पहचान के रूप में विकसित किया जाएगा।

शंकराचार्य ने बताया कि इस संगठन का औपचारिक शुभारंभ आगामी माघ अमावस्या के अवसर पर संगम स्नान के साथ किया जाएगा। इस दौरान देशभर से बड़ी संख्या में लोगों के शामिल होने की संभावना जताई जा रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल धार्मिक संगठन के साथ-साथ सामाजिक और वैचारिक स्तर पर भी प्रभाव डाल सकती है। हालांकि, संगठन की गतिविधियां किस दिशा में आगे बढ़ती हैं, इस पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।

फिलहाल इस घोषणा के बाद धार्मिक और सामाजिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है और इसे एक बड़े संगठनात्मक प्रयास के रूप में देखा जा रहा है, जो आने वाले समय में विभिन्न मुद्दों पर अपनी भूमिका निभा सकता है।

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