ईरान युद्ध के बीच ट्रंप का चीन दौरा टला, NATO पर भड़के

ईरान युद्ध के चलते बदली प्राथमिकताएं, 5-6 हफ्तों में हो सकती है शी से मुलाकात

यूपी क्राइम अलर्ट न्यूज़ ब्यूरो

नई दिल्ली: डोनाल्ड ट्रंप ने मंगलवार को अपना प्रस्तावित चीन दौरा टाल दिया है। यह दौरा इसी महीने के अंत में होना था, लेकिन ईरान के साथ जारी युद्ध की वजह से इसे स्थगित कर दिया गया। व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि मौजूदा हालात को देखते हुए उन्हें अपनी प्राथमिकताएं बदलनी पड़ीं, हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह दौरा पूरी तरह रद्द नहीं हुआ है।ट्रंप ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि वह अगले पांच से छह हफ्तों में चीन का दौरा करेंगे और वहां शी जिनपिंग के साथ महत्वपूर्ण वार्ता करेंगे। उन्होंने जोर देकर कहा कि अमेरिका और चीन के बीच कामकाजी रिश्ते काफी मजबूत हैं और इस देरी से द्विपक्षीय संबंधों पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा।ट्रंप ने यह भी कहा कि वह शी जिनपिंग से मिलने के लिए उत्साहित हैं और उन्हें भरोसा है कि चीनी राष्ट्रपति भी इस मुलाकात का इंतजार कर रहे हैं।
ट्रंप ने चीन के साथ व्यापारिक संबंधों की भी सराहना की और कहा कि बेहतर तालमेल से अमेरिका को आर्थिक रूप से फायदा हो सकता है। गौरतलब है कि राष्ट्रपति बनने से पहले ट्रंप चीन को एक बड़ा रणनीतिक प्रतिद्वंद्वी बताते रहे हैं, लेकिन अब उनके रुख में नरमी देखने को मिल रही है।इस बीच ट्रंप ने यह भी संकेत दिया कि उनका चीन दौरा कुछ हद तक अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और सहयोग पर निर्भर करता है। उन्होंने पहले कहा था कि होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने के लिए अमेरिका को चीन की मदद की जरूरत हो सकती है। हालांकि, बीजिंग की ओर से साफ कर दिया गया है कि इस दौरे का उस मुद्दे से कोई सीधा संबंध नहीं है।दूसरी ओर ट्रंप ने नाटो और अन्य सहयोगी देशों पर तीखा हमला बोला।उन्होंने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा के लिए की गई उनकी अपील को अधिकतर सहयोगी देशों ने ठुकरा दिया है। ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर पोस्ट करते हुए कहा कि कई देश इस बात से सहमत हैं कि ईरान को परमाणु हथियार नहीं मिलने चाहिए, लेकिन इसके बावजूद वे सैन्य अभियान में शामिल होने से पीछे हट रहे हैं।ट्रंप ने आरोप लगाया कि अमेरिका वर्षों से अपने सहयोगियों की सुरक्षा पर भारी खर्च करता रहा है, लेकिन जब अमेरिका को समर्थन की जरूरत होती है, तो ये देश पीछे हट जाते हैं। उन्होंने नाटो को ‘एकतरफा व्यवस्था’ बताते हुए कहा कि अमेरिका को अब अपनी रणनीति पर स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ना चाहिए।उन्होंने यह भी दावा किया कि ऑस्ट्रेलिया, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने भी मदद के उनके आह्वान को स्वीकार नहीं किया। ट्रंप के अनुसार, हाल की सैन्य कार्रवाई में मिली सफलता के बाद अमेरिका को अब किसी बाहरी सहयोग की आवश्यकता नहीं है और वह अपने दम पर स्थिति को संभाल सकता है।गौरतलब है कि 28 फरवरी से अमेरिका और इजरायल द्वारा शुरू किए गए सैन्य अभियान के बाद से पश्चिम एशिया में तनाव लगातार बढ़ रहा है। इसके जवाब में ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में स्थित अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया है और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य में गतिविधियों को बाधित करने की कोशिश की है।विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह टकराव इसी तरह जारी रहा, तो इसका असर न केवल क्षेत्रीय सुरक्षा पर बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा आपूर्ति पर भी पड़ सकता है। ऐसे में ट्रंप का चीन दौरा टलना और सहयोगियों के साथ मतभेद उभरना अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है।

महंगे ड्रोन ढेर, अब सस्ते ‘लुकास’ पर अमेरिका का भरोसा

अमेरिका-इजरायल के नेतृत्व वाले सैन्य अभियान के दौरान ईरान के खिलाफ चल रही कार्रवाई में अमेरिकी सेना को बड़ा झटका लगा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, फरवरी के अंत से अब तक अमेरिका के कम से कम 11 अत्याधुनिक‌ एम क्यू-9 रेपर ड्रोन ईरानी वायु रक्षा प्रणालियों द्वारा मार गिराए जा चुके हैं। इन ड्रोन की कीमत 30 से 32 मिलियन डॉलर प्रति यूनिट बताई जाती है, जिसके चलते कुल नुकसान 330 मिलियन डॉलर से अधिक आंका जा रहा है।विशेषज्ञों के अनुसार, ये ड्रोन मूल रूप से आतंकवाद विरोधी अभियानों के लिए तैयार किए गए थे और इनकी अधिकतम गति करीब 480 किमी प्रति घंटा है। लेकिन आधुनिक युद्ध परिस्थितियों में ये ड्रोन उन्नत एयर डिफेंस सिस्टम के सामने कमजोर साबित हुए हैं। ईरान की ओर से इस्तेमाल की जा रही एस-300 एयर डिफेंस सिस्टम और खोरदाद-15 एयर डिफेंस सिस्टम जैसी प्रणालियों ने इन ड्रोन को निशाना बनाकर अमेरिका की रणनीति को बड़ा झटका दिया है।इन लगातार हो रहे नुकसानों के बाद अमेरिकी सेना अब अपनी रणनीति में बदलाव कर रही है। इसी कड़ी में ‘लुकास’ नाम का कम लागत वाला नया ड्रोन सामने आया है, जिसे भविष्य की लड़ाई के लिए ज्यादा प्रभावी विकल्प माना जा रहा है। यह ड्रोन ईरान के चर्चित शाहेद-136 ड्रोन की तर्ज पर विकसित किया गया है, लेकिन इसमें अमेरिकी तकनीक का उन्नत इस्तेमाल किया गया है।विश्लेषकों का मानना है कि आधुनिक युद्ध अब महंगे और भारी उपकरणों के बजाय सस्ते, तेज और बड़ी संख्या में इस्तेमाल किए जा सकने वाले ड्रोन की दिशा में बढ़ रहा है। ऐसे में ‘लुकास’ जैसे ड्रोन अमेरिका के लिए लागत और रणनीति दोनों स्तर पर अहम भूमिका निभा सकते हैं।

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