नई दिल्ली:
पश्चिम एशिया में एक बार फिर तनाव चरम पर पहुंचता दिख रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य के पास अमेरिकी नौसेना द्वारा एक ईरानी जहाज को रोके जाने की घटना ने न केवल अमेरिका और ईरान के बीच टकराव को बढ़ा दिया है, बल्कि चीन की भूमिका को लेकर भी नई बहस छेड़ दी है। इस घटनाक्रम के साथ-साथ पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से जुड़े एक कथित ‘परमाणु हमले’ के दावे ने वैश्विक स्तर पर चिंता और चर्चाओं को और तेज कर दिया है।
सबसे पहले बात करते हैं उस जहाज की, जिसने इस पूरे विवाद को जन्म दिया। जानकारी के अनुसार, अमेरिका ने ओमान की खाड़ी के पास ईरान के झंडे वाले कंटेनर जहाज ‘तूस्का’ को रोक लिया। यह जहाज इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान शिपिंग लाइंस IRISLसमूह से जुड़ा बताया जा रहा है, जो पहले से ही अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे में है। अमेरिकी केंद्रीय कमान CENTCOM का कहना है कि शुरुआती जांच में जहाज में मौजूद सामग्री ‘डुअल-यूज’ यानी दोहरे उपयोग वाली हो सकती है जिसका इस्तेमाल औद्योगिक और सैन्य दोनों उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है।
इन्हीं आरोपों के बीच अमेरिकी रिपब्लिकन नेता निक्की हैले ने एक बड़ा दावा किया है। उन्होंने कहा कि यह जहाज चीन से ईरान की ओर जा रहा था और इसमें मिसाइल निर्माण से जुड़े रसायन लदे हुए थे। हैले के मुताबिक, अमेरिकी नौसेना ने जहाज को कई बार चेतावनी दी, लेकिन वह नहीं रुका, जिसके बाद उसे रोकना पड़ा। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि चीन, ईरान को युद्ध जैसी स्थिति में मदद कर रहा है और यह अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा बन सकता है।
हालांकि, इन दावों की अभी तक स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो पाई है। विशेषज्ञों का मानना है कि ‘डुअल-यूज’ सामग्री का मतलब यह नहीं होता कि उसका इस्तेमाल निश्चित रूप से सैन्य उद्देश्यों के लिए ही किया जाएगा। धातु, पाइप और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जैसे सामान आमतौर पर कई उद्योगों में उपयोग किए जाते हैं, लेकिन कुछ परिस्थितियों में इन्हें मिसाइल या रक्षा कार्यक्रमों में भी शामिल किया जा सकता है।
दूसरी ओर, ईरान ने इस कार्रवाई को ‘समुद्री लूट’ करार देते हुए कड़ा विरोध जताया है। तेहरान का कहना है कि अमेरिका अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन कर रहा है और जानबूझकर क्षेत्र में तनाव बढ़ा रहा है। ईरान ने साफ संकेत दिए हैं कि जब तक अमेरिका उस पर लगाए गए प्रतिबंधों और ‘नाकेबंदी’ को नहीं हटाता, तब तक वह किसी भी प्रस्तावित शांति वार्ता में हिस्सा नहीं लेगा।
यह घटना ऐसे समय पर हुई है जब पहले से ही होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे संवेदनशील समुद्री मार्गों में से एक बना हुआ है। वैश्विक तेल आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है, ऐसे में यहां किसी भी तरह का सैन्य या राजनीतिक तनाव अंतरराष्ट्रीय बाजारों और ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा असर डाल सकता है।
इसी बीच एक और दावा सामने आया है, जिसने इस पूरे तनाव को और जटिल बना दिया है। पूर्व सीआईए विश्लेषक लारी जॉनसन ने दावा किया है कि अमेरिका और ईरान के बीच एक टकराव के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने कथित तौर पर परमाणु हमले पर विचार किया था। जॉनसन के अनुसार, एक आपात बैठक में ट्रंप बेहद गुस्से में थे और उन्होंने ईरान के खिलाफ परमाणु विकल्प पर चर्चा की। हालांकि, अमेरिकी सेना के शीर्ष अधिकारी ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ ने इसका विरोध किया और इसे बेहद खतरनाक कदम बताते हुए रोक दिया।
इस दावे ने राजनीतिक और रणनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है, लेकिन इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। न तो अमेरिकी प्रशासन और न ही किसी विश्वसनीय स्वतंत्र स्रोत ने इस तरह की किसी बैठक या निर्णय की पुष्टि की है। ऐसे में विशेषज्ञ इस दावे को लेकर सतर्क रहने की सलाह दे रहे हैं।
दरअसल, अमेरिका में परमाणु हथियारों के इस्तेमाल का अंतिम अधिकार राष्ट्रपति के पास जरूर होता है, लेकिन इसके साथ कई स्तरों की प्रक्रियाएं, सलाह-मशविरा और सुरक्षा जांच जुड़ी होती हैं। किसी एक बैठक में अचानक परमाणु हमले का फैसला लेना व्यावहारिक रूप से बेहद जटिल और असंभव माना जाता है। यही वजह है कि कई विश्लेषक इस दावे को राजनीतिक बयानबाजी या व्यक्तिगत राय का हिस्सा मान रहे हैं।
फिर भी, इस तरह के दावे अंतरराष्ट्रीय माहौल को प्रभावित करते हैं। जब दुनिया पहले से ही कई मोर्चों पर अस्थिरता का सामना कर रही हो, तब परमाणु हथियारों से जुड़े किसी भी बयान या संकेत से तनाव और बढ़ सकता है। खासकर पश्चिम एशिया जैसे संवेदनशील क्षेत्र में, जहां छोटे-छोटे घटनाक्रम भी बड़े संघर्ष का रूप ले सकते हैं।
चीन का नाम इस पूरे विवाद में आना भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। अमेरिका लंबे समय से चीन पर आरोप लगाता रहा है कि वह अप्रत्यक्ष रूप से ईरान का समर्थन करता है, जबकि चीन इन आरोपों को खारिज करता आया है। यदि जहाज में वाकई चीन से भेजी गई कोई संवेदनशील सामग्री पाई जाती है, तो यह अमेरिका-चीन संबंधों में भी नई खटास पैदा कर सकता है।
कुल मिलाकर, होर्मुज में जहाज की जब्ती, निक्की हैले के आरोप, ईरान की प्रतिक्रिया और ट्रंप से जुड़े परमाणु दावे—ये सभी घटनाएं मिलकर एक ऐसे जटिल भू-राजनीतिक परिदृश्य को सामने लाती हैं, जहां तथ्य, आरोप और आशंकाएं एक-दूसरे में उलझी हुई हैं।
जब तक इन दावों की पुष्टि ठोस और विश्वसनीय स्रोतों से नहीं होती, तब तक इन्हें सावधानी के साथ ही देखना जरूरी है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि इस पूरे घटनाक्रम ने पश्चिम एशिया में तनाव को और बढ़ा दिया है, जिसका असर आने वाले दिनों में वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
